Sunday 4 October 2015

प्राचीन भारत में विकसित थी अंग प्रत्यारोपण विधा

  अंग प्रत्यारोपण यानि कि ऑर्गन ट्रांसप्लांट, आपको क्या लगता है कि यह विधा भारत में कब आई? 




अंग प्रत्यारोपण यानि कि ऑर्गन ट्रांसप्लांट, आधुनिक चिकित्सा पद्वति का एक बड़ा हिस्सा बन चुका है। लेकिन आपको यह जानकर यकीन नहीं होगा कि प्राचीन समय में जब कथित तौर पर चिकित्सा प्रणाली अपने शुरुआती चरण में ही थी, तब भी भारत में अंग प्रत्यारोपण किया जाता था।

वैश्विक स्तर पर स्वीकृत आयुर्वेद की उत्पत्ति भी भारत में ही हुई थी। हिन्दू पौराणिक कथाओं के अनुसार समुद्र मंथन से उत्पन्न हुए दिव्य चिकित्सक धनवंतरि ने आयुर्वेद की रचना कर इस ग्रंथ को प्रजापति को सौंप दिया था, ताकि इसकी सहायता से मानव जाति की रक्षा की जा सके।

अथर्ववेद की रचना के साथ ही भारत में चिकित्सा पद्वति का उदय हो गया था। इस वेद में रोगों के लक्षण को पहचानने और उनसे मुक्ति पाने के लिए उपयोगी औषधियों का भी जिक्र किया गया है। अथर्ववेद और आयुर्वेद के इतर हिन्दू पौराणिक गाथाओं में स्वस्थ रहने के लिए जरूरी आहार, व्यवहार और विभिन्न बीमारियों के उपचार का जिक्र है।

हिन्दू धर्म से जुड़े प्राचीन ग्रंथों के अनुसार मानव शरीर से जुड़े तीन दोष पहचाने गए हैं, जिन्हें वात, पित्त और कफ कहा जाता है। इन तीनों के ही उचित अनुपात पर ही किसी भी व्यक्ति का शारीरिक स्वास्थ्य निर्भर करता है। जब भी किसी व्यक्ति के शरीर में इन तीन दोषों का अनुपात बिगड़ता है तो उसका शरीर अस्वस्थ हो जाता है।

बिगड़े अनुपात की वजह से उत्पन्न हुए लक्षणों को पहचाना जाता है और संतुलन का आंकलन कर उपचार शुरू किया जाता है।

इसी तरह मनुष्य की जीवनशैली को भी राजसिक, तामसिक और सात्विक नामक तीन भागों में विभाजित किया गया है। वैज्ञानिक भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि व्यक्तिगत जीवनशैली या लाइफ स्टाइल ही स्वस्थ और अस्वस्थ शरीर का कारण बनती है।

हिन्दू पौराणिक कथाओं में गणेश जी के धड़ पर हाथी का सिर दिखाया गया है। विष्णु के वराह अवतार के धड़ पर सूअर का सिर और नरसिंह अवतार पर सिंह का सिर मौजूद है। यह इस बात का प्रमाण है कि भारत के चिकित्सकों को वैचारिक प्रेरणा तो पौराणिक काल में ही मिल गई थी।

प्राचीन समय में भारतीय चिकित्सक उपचार में अत्यन्त प्रभावी तरीकों को अपनाते और नए-नए तरीकों का आविष्कार करते थे। उनके पास वो तरीके भी थे, जिनके द्वारा वह रुग्ण अंगों को काटकर उनके स्थान पर दूसरे अंगों को प्रत्यारोपित करते थे।


उन्होंने विभिन्न प्रकार के शल्य यंत्रों को भी निर्मित किया था जिनकी सहायता से वह शिक्षार्थियों को सिखाने का प्रयत्न करते थे।

वह ना सिर्फ मानव शरीर पर बल्कि मृत पशुओं के शरीर पर शल्य चिकित्सा का अभ्यास किया करते थे। भारतीय शल्य चिकित्सा को इसके बाद चीन, श्रीलंका और दक्षिण पूर्वी एशिया के कई अन्य देशों में भी फैलाया गया था।

आपको यह बात अतिश्योक्ति लग सकती है लेकिन ईसा से छठी शताब्दी पूर्व ही भारतीय चिकित्सकों ने स्नायु तंत्र से जुड़े चिकित्सयीय ज्ञान का उल्लेख कर दिया था। सैकड़ों वर्ष पूर्व ही इन चिकित्सकों को पाचन प्रणाली, विभिन्न पाचक द्रव्यों तथा भोजन में मौजूद पौष्टिक तत्वों और रक्त के निर्माण की भी संपूर्ण जानकारी थी।

ऋषि पिप्पलाद कृत गर्भ उपनिषद में मानव शरीर में मौजूद 108 जोड़, 107 मर्मस्थल, 109 स्नायुतंत्र और 707 नाड़ियों, 360 हड्डियों, 4.5 करोड़ सेल और 500 मैरो का उल्लेख किया गया है।

इसके अलावा यह भी बताया गया है कि हृदय का वजन 8 तोला, जीभ का 12 तोला और लिवर का वजन एक सेर होता है। गर्भ उपनिषद में यह भी उल्लिखित है कि प्रत्येक व्यक्ति के भोजन ग्रहण करने और उसे पचाने की क्षमता कभी भी समान नहीं होती।

शायद यह बात आपको अविश्वसनीय लगे लेकिन प्राचीन भारतीय चिकित्सक इलाज की हर उस विधा से परिचित थे, जिन्हें आज अपनाया जाता है। फर्क बस इतना है पहले तकनीक और विज्ञान का विकास उस हद तक नहीं था लेकिन वैचारिक रूप में प्राचीन भारतीय चिकित्सक अपेक्षाकृत अधिक सशक्त थे।

हम भारतीयों के पास हमारे इतिहास और उपलब्धियों पर गर्व करने के लिए बहुत कुछ है। चिकित्सा से जुड़ा यह पक्ष उन में से ही एक है।


                                                                      sanatan path
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